Poems - Part 2

नया भारत बनाना है

जब लड़ाई – झगड़े का ज़माना था ,
तब तुम जीते थे , और मै हारा था ।
जब हमें अपनी चीज को वापस पाना था ,
तब हम जीते थे , और वो हारा था ।
हम से निकलकर , तुम कहाँ खो गए ,
न हम बचे न तुम , सारे उसूल सो गए ।
खत – किताब तो एक बहाना है ,
उसूलों को जगाना है ।
हम से हम को खोकर , तुम से तुम को खोकर
नया भारत बनाना है ।
सार्थक बसंत

सीरिया हो य हो म्यांमार
अफगानिस्तान हो य हो भारत
सीमा पर मर रहे जवान
बच्चों की किलकारियां हैं लहूलुहान
कितना ही डाला गया पिचकारियों में रंग
फिर भी
बहुतों की जिंदगानियां, और ज्यादा ही बेरंग
इसीलिये, अच्छा नहीं लगता मुझे
होली का हुडदंग
चलो मिलकर भरें
अधरों पर
मुस्कानों के रंग
तभी सार्थक होगा रंग-बिरंगा बसंत
खयालात कुछ ज्यादा हैं

तेरे बारे में
मेरे खयालात कुछ ज्यादा हैं
तू ना समझे
तेरी बेवफाई कुछ ज्यादा है
न कल मिलने का इरादा था तेरा न आज का वादा है

मै और क्या कहूँ
मेरी फितरत ही हँसी की है
तू -तेरी आस ! मिलेगी कभी
इस चाहत में मुद्दतें गुजारी हैं मैनें
तू अश्क बहाये कितना भी
चाह दिखाये कितना भी
तेरी न कल मिलनें की चाहत थी
ना आज का इरादा है

यूँ ना टूटेंगें हम
मेरा विस्वास कुछ ज्यादा है
तेरे सितम ना-पाक हैं ,
मुझे कहना कुछ ज्यादा है
सच बोलनें की तेरी आदत न सही
कुछ बोल ,
तेरी आवाज ए असर
कुछ ज्यादा है

समझ सकता हूँ
चुप्पी भी तेरी
क्या कहूँ , तेरी चुप्पी में भी
झूठ कुछ ज्यादा है
और क्या कहूँ तेरे बारे में
मेरे खयालात कुछ ज्यादा हैं

 

मनुष्यों सी आदतें

मनुष्यों के साथ रहते-रहते
तुम भी सीख गये हो
मनुष्यों सी आदतें

अब तुम्हे ज्यादा जगह और ज्यादा जगह चाहिये
तुम चाहते हो और ज्यादा उड़ना,
फैलना, और किसी अन्य प्रजाति के लिये जगह न छोड़ना
तुम्हारे अन्दर भी विस्तार की प्रवृत्ति घर करती जा रही है

तुम उन्हें भी छेड़ते, डराते हो
जो शांति से अपनें आरक्षित और निश्चित स्थान पर
रहना और आना-जाना चाहते हैं

मै देखता हूँ कि
ईर्ष्या – द्धेष – भय और संग्रह सहित
न जानें कौन-कौन सी मनुष्यगत दुष्प्रवृत्तियाँ
तुम्हारे भी अन्दर घर करती जा रही हैं

मनुष्यों के साथ रहते-रहते
तुम भी सीख गये हो
मनुष्यों सी आदतें

अब मुझे अच्छा नहीं लगता
तुम्हारा बिलावजह फड़फड़ाना
बिना इजाजत बार-बार कमरे के अन्दर आना
और फिर ढेर सारी गंदगी फैलाना

चूँकि
मनुष्यों के साथ रहते-रहते
तुम भी सीख गये हो
मनुष्यों सी आदतें
(22 फरवरी 2018 को गांधी शांति प्रतिष्ठान में -“स्वरचित” )

कुछ लोग

कुछ लोग थे ,
जिन्दगी नें जिन्हे बड़ी शिद्दत से पुकारा था
वे आये , रहेंगे साथ हमेशा , ये सोच रखा था
वे चले गये , बिना कुछ कहे बिना बताये

कुछ लोग थे ,
बिना पुकारे , बिना बुलाये , वे आये
जगने लगी जब आस , रहेंगे पास
वे चले गये , बिना कुछ कहे बिना बताये

कुछ लोग थे ,
बिना मतलब मिल गये , जिन्दगी की राहों में
फिर जगने लगी आस , था थोड़ा आभाष
वे कुछ कहते भी नहीं हैं
साथ रहते भी नहीं हैं
दुआ करता हूँ !
चले जायें वे अभी , बिना कुछ कहे बिना बताये

कुछ लोग हैं ,
थोड़े फासले पे सही
कुछ-कुछ कहते भी हैं
साथ रहते भी हैं
लेकिन अब !
जिन्दगी का मिजाज बदल गया है
ख्वाब और आसमान बदल गया है
डरता तो हूँ , लेकिन कहता भी हूँ
चले जायें वे अभी , बिना कुछ कहे बिना बताये

झूठ-सच

तेरा बहाना झूठ है , तेरा फसाना झूठ है
वो तेरा फरेब कि तेरी बातों में हम आये
अब जा रहा हूँ , दे बद्दुआयें जो जी में आये
तेरा अफ़साना झूठ ,आसूँ बहाना झूठ

वो तेरी जीत तुझे मुबारक
मै मेरी हार पर फिदा हूँ
वो भी साथ छोड़ेगी मेरा जल्दी
मेरी हार भी बे-वफा
तेरी जीत भी बे-वफा

तेरी दुआएं भी झूठ, तेरी बद्दुआएँ भी झूठ
तेरा कल भी झूठ , तेरा आज भी झूठ
तेरा झूठ भी झूठ , तेरा सच भी झूठ

मेरा बहाना है सच , मेरा फसाना है सच
हर अफसाना है सच , हर दुआ है सच
मेरा कल भी सच , मेरा आज भी सच

जो लोग भेड़िये होते हैं

आखिर तुम उनमें से ही निकले
जो लोग भेड़िये होते हैं
खातें हैं साग-हरी सब्जी ,सब खून नजर से पीते हैं
बोलेंगे शब्द जुबानों से ,पर नमक घाव में भरते हैं
आखिर तुम उनमें से ही निकले
जो लोग भेड़िये होतें हैं

तन – पहनावा , चाल-चरित सब
आदम जैसे होते हैं
ताकतवर से पूँछ हिलायें
कमजोरों पर चिढ़ते हैं
आखिर तुम उनमें से ही निकले
जो लोग भेड़िये होते हैं

पर प्रवचन और मीठी वाणी
दमदारों की करें गुलामी
जब-तब देखौ दगा करत हैं
यार बदल कै , साथ बदल कै
झूठ-साँच सब कहत फिरत हैं
आखिर तुम उनमें से ही निकले
जो लोग भेड़िये होते हैं

झूठ-सच

कालेज के छात्र संघ चुनाव में स्वयं के परिचय में कुछ लाइनें अकस्मात् बोल दी — यादों के झरोखों से वे चन्द लाइनें
चिर-चिंतन नें ढाला हमको , कठिनाई से लड़ना सीखा ।
आये हम कालेज में पढ़ने , छात्र हितों की रक्षा करने ।

विद्रोह हमारी भाषा है , पहचान हमारी बागी है ।
हर उलझन और हर मुश्किल में , हम आपके साथी हैं ।

शोलों में हूँ लावा जैसा , पानी में गंगाजल जैसा ।
भड़काओगे जल जाओगे , पी जाओगे अमृत पाओगे ।

ये उद्घोष हमारे शब्दों का , गूंजेगा महाविद्यालय में ।
आवाज हमारी पहुंचेगी , सत्ता के गलियारे में ।

यदि मुझको साथ तुम्हारा हो , सारे जग को बतलादेंगे ।
कोई आये या न आये , हम विजयध्वज फहरादेंगे ।